Sunday, 18 September 2011

वक़्त!!!

इस कदर वक़्त की कमी होगी सोचा न था,
दौड़ रहे है हम पर ज़िन्दगी थमी होगी सोचा न था,

सोचा था मंजिल पाकर सब पा लेंगे,
मक़ाम पाकर भी ज़िन्दगी मैं कुछ कमी होगी सोचा न था,

बेशक रोज़ सुबह एक नया दिन तो शुरू होता है,
पर ज़िन्दगी में नयापन सा कुछ नहीं,

रोज़ अपने मिलने वालों में अपनों को तलाशता हूँ,
लेकिन पत्थर के इस शहर अपनेपन सा कुछ नहीं,

रातों में अपनों की याद में,
बच्चो सा रोता हूँ मैं!!


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