Sunday, 18 September 2011

सिर्फ तुम

सागर में खुद को डुबो के चाहा, तेरे दर्द से उबर जाये हम,
सागर भी तेरे दर्द के आगे कम था, ऐ मेरे मौला अब किधर जाये हम,

इस कदर तुझमे समां गयी थी मेरी ज़िन्दगी,
यहाँ भी तुम थे, मेरे लिए वहां भी तुम थे,
तेरे बगैर क्या होगा मेरा, मेरे हमदर्द,
मेरी ज़मीं भी तुम थे, मेरे आसमां भी तुम थे,  
मेरे हर दिन, हर रात, हर बात तुमसे थी,  
मेरा दर्द भी तुम थे, मेरी दवा भी तुम थे,
तेरी वफ़ा पे नाज़ था, तेरी बेवफाई ने दिल तोड़ दिया,
बावफा भी तुम थे, बेवफा भी तुम थे,

अब तो तेरा चेहरा भी भूलने लगा है,
इश्क करने की यह कैसी सजा है,
हमेशा चाहा तू मेरे साथ रहे हरदम,
पर जाने क्यूँ तू मुझसे जुदा है,
ऐ खुदा मेरा माही लौटा दे मुझे,
कम से कम मेरा माही मुझसे जुड़ा है,
एक अरसे से तेरी यादों में जी रहा हूँ,
दुनिया में क्या हुआ, मुझको क्या पता है,
मेरी ख़ामोशी का सबब न पूछो मुझसे,
मुझपर तेरी बेवफाई का जाम लगा है,
दिल इस कदर तेरी यादों को भूलना चाहता है,
कि तुझे भूलने के लिए भी तुझको याद करता रहा है,

और भी गम है ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
पर यकीं जानो, मोहब्बत से बढ़कर गम कोई नहीं,
ज़िन्दगी खुशगवार होगी, तो हमदम ही हमदम होगे,
जब गम का साया होगा, तो जानोगे हमदम कोई नहीं,





तुम...

तुम न हो तो कभी सवेरा न हो,
जो तुम न हो तो मेरी रातें नहीं,

एक पल भी मेरा ऐसा कभी न गुज़रा, 
जब तुम मुझे याद आते नहीं,

तेरी याद में दिल तड़पता तो है,
पर पता है मुझे, मिलना हैं हमे एक दिन,
तेरा एहसास, तेरी याद, तेरी बातें, मरी हिम्मत हैं,
वरना एक एक दिन, साल सा हैं तेरे बिन,

जो चाहा वोह सब मिला, बस तेरे साथ के सिवा,
क्यों ऐसा है कि अपनी मुलाकाते नहीं,

जो तुम न हो तो मेरी रातें नहीं,



  

मोहब्बत

करीब रहकर भी हमारे दरमियाँ फासला है मीलों लम्बा
क्या साथ रहते रहते मोहब्बत कम हो जाती है
जब किसी को मिल जाता है उसका खुदा, तो आप ही बताइए हुज़ूर
क्या उसकी इबादत कम हो जाती है

क्या साथ रहते रहते मोहब्बत कम हो जाती है

हम ही क्यों न जान पाए मोहब्बत की ताक़त को
सुना था मोहब्बत के आगे हुकूमत कम हो जाती है

क्या साथ रहते रहते मोहब्बत कम हो जाती है

अब तो कोई रिश्ता न रहा तेरे मेरे दरमियाँ 
फिर भी क्यूँ तेरे ज़िक्र पे ये आँखें नाम हो जाती है

क्या साथ रहते रहते मोहब्बत कम हो जाती है

क्या लिखू, क्या कहू...

कैसे लिखू मैं, और क्या लिखू मैं,
न इतने लब्ज़ हैं न ही इतना वक़्त है,

तेरे साथ गुज़रा वोह वक़्त, शायद निचोड़ है मेरी ज़िन्दगी का,
तुझे बताना है तू ही है ज़रिया मेरी हर ख़ुशी का,

कैसे कहू मैं, और क्या कहू मैं,

हाथ हाथो में लेकर घंटो बैठे रहना,
तेरी आँखों में आँखें डालकर कुछ न कहना,

तेरी हथेली की लकीरों में खोजना अपने नाम को,
सुबह की मुलाक़ात के बाद इंतज़ार करना तेरा शाम को!!!


वक़्त!!!

इस कदर वक़्त की कमी होगी सोचा न था,
दौड़ रहे है हम पर ज़िन्दगी थमी होगी सोचा न था,

सोचा था मंजिल पाकर सब पा लेंगे,
मक़ाम पाकर भी ज़िन्दगी मैं कुछ कमी होगी सोचा न था,

बेशक रोज़ सुबह एक नया दिन तो शुरू होता है,
पर ज़िन्दगी में नयापन सा कुछ नहीं,

रोज़ अपने मिलने वालों में अपनों को तलाशता हूँ,
लेकिन पत्थर के इस शहर अपनेपन सा कुछ नहीं,

रातों में अपनों की याद में,
बच्चो सा रोता हूँ मैं!!


Saturday, 17 September 2011

Valentine's Day


तुमको बताना है मेरे लिए ख़ास हो तुम,
मेरी हर जीत हर खुशी का एहसास हो तुम,

यूं तो कुछ ख़ास नही मेरी जिंदगानी में,
पर इस जिंदगानी की ख़ास याद हो तुम,

मुझसे पहले मेरा दर्द जान लेते हो तुम,
मेरी हर जिद को मान लेते हो तुम,

अब डर नही मुझे किसी भी ग़म का,
खुदा का शुक्र है की मेरे पास हो तुम,

तुम्हारे बिना जिंदगी में तनहा हूँ मैं,
तेरा साथ पा कर ही संभला हूँ मैं,

तेरे बिना क्या होगा मेरा मेरे हमसफ़र,
मेरे लिए तो मेरी धरती, मेरा आकाश हो तुम 
 
मेरी हर जीत हर खुशी का एहसास हो तुम,
 

संप्रदायक अयोध्या


अयोध्या का अतीत ही जाने
मंदिर था या मस्जिद थी
पर 92 में जो भी हुआ
वो बस सियासी जिद थी

क्यों लगता है हिन्दू को
की वो खुदा से दूर है
मुसलमान की दिल में भी
भगवान भरपूर है

बेक़सूर और मज़लूमो थे वो
जो मारे गए उस काली जिद में
राम नहीं चाहते ऐसा मंदिर
खुदा भी न बसेंगे ऐसी मस्जिद में

कैसे मिलोगे अपनों से ईद
कैसे जलाओगे दिवाली में दिए
भाईचारा बनाओ राम के वास्ते
मिलजुल के रहो खुदा के लिए

भाईचारा बनाओ राम के वास्ते
मिलजुल के रहो खुदा के लिए

भाईचारा बनाओ राम के वास्ते
मिलजुल के रहो खुदा के लिए

क्या लिखू.....

लिखो, कुछ तो लिखो तुम,
मेरे दिल के कागज़ पर कुछ तो लिखो तुम,
मेरी ख्वाइश है, मेरे दिल के पन्नो में रंग भर दो तुम,
लिखो, कुछ तो लिखो तुम,

क्या पता नहीं तुम्हे, की मरे लिए खास हो तुम,
मेरे आने वाले कल का एहसास हो तुम,
लिखो, कुछ तो लिखो तुम,

पलके मूंदू तो तुम्हे देखू, आँखें खोलू तो तुम्हे सोचू,
जो आ जाओ तुम मेरे सामने, तो तुम्हे भाओं में भर लू,
लिखो, कुछ तो लिखो तुम,